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बुधवार, 18 मई 2011

भारद्वाज ने कहा, येद्दियुरप्पा के पास भारी बहुमत

भारद्वाज ने कहा, येद्दियुरप्पा के पास भारी बहुमत



बेंगलूर। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने बुधवार को कहा कि मुख्यमंत्री बी एस येद्दियुरप्पा के पास भारी बहुमत है और इस बारे में कोई संदेह नहीं है।

कर्नाटक में भाजपा सरकार के साथ एक तरह से चल रहे राजनीतिक युद्ध के बीच, यहां एक सरकारी समारोह में मुख्यमंत्री के साथ मौजूद भारद्वाज ने अपने और येद्दियुरप्पा के बीच मतभेदों से बचने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के करीब एक सप्ताह बाद पहली बार भारद्वाज और येद्दियुरप्पा एक मंच पर नजर आए।

बहरहाल, खुद को वापस बुलाए जाने की भाजपा की मांग पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि राज्यपाल के तौर पर उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति ने की थी तथा उनके [राष्ट्रपति के] अलावा और कोई उन्हें [भारद्वाज को] वापस नहीं बुला सकता।

कर्नाटक लोकसेवा आयोग के स्वर्ण जयंती समारोह में उन्होंने कहा, 'मैं यह तथ्य जानता हूं कि मुझे पूरी तरह संविधान के अनुरूप ही काम करना है।'

राज्यपाल ने कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की थी जिसके बाद भारद्वाज के खिलाफ भाजपा के उच्च्च स्तरीय अभियान में भाग ले कर आज सुबह नई दिल्ली से लौटे येद्दियुरप्पा तनावमुक्त नजर आए और मंच पर दोनों को कई बार बातचीत करते देखा गया। भारद्वाज ने अपने संबोधन में कहा 'यह समझना चाहिए कि मुख्यमंत्री राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। उनके पास भारी बहुमत है, इस बारे में कभी कोई विवाद नहीं रहा और हम मित्र हैं। यह राजनीतिक तनाव अप्रासंगिक है। हमें खुद को संविधान और कानून के प्रति समर्पित करना होगा।'

उन्होंने कहा कि जहां तक उनका सवाल है तो उनकी कुछ भी गलत करने की कोई योजना नहीं है लेकिन, 'मेरे हाथ संविधान से बंधे हुए हैं।'

भारद्वाज ने कहा कि वह चाहते हैं कि कर्नाटक में उनकी सरकार एक ख्यातिप्राप्त सरकार बने। उपनिषद को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि अतिथि भगवान की तरह होता है और राज्यपाल के तौर पर वह राज्य के अतिथि हैं।

नई दिल्ली में पिछले दो दिन में भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात कर, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की भारद्वाज की सिफारिश को खारिज करने और उन्हें वापस बुलाने की मांग की।

मुख्यमंत्री राज्यपाल से मिल कर, अपनी सरकार का बहुमत साबित करने के लिए विधानसभा का सत्र शीघ्र बुलाने का अनुरोध करेंगे।

भारद्वाज ने येद्दियुरप्पा को राज्य के विकास के लिए कड़ी मेहनत करने वाला मुख्यमंत्री करार दिया। उन्होंने कहा 'अभी भी मुख्यमंत्री राज्य के विकास के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि वह दिन में 18 से 20 घंटे तक काम करते हैं।'

राज्यपाल ने यह आरोप खारिज कर दिया कि वह पक्षपात करते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी पक्षपात नहीं किया। उन्होंने कहा कि येद्दियुरप्पा के खिलाफ उनके मन में कुछ भी नहीं है।

उन्होंने कहा, 'मेरे चपरासी से लेकर सचिव तक, मैं सभी के साथ प्यार और अपनेपन से व्यवहार करता हूं और बदले में यही चाहता हूं।' मुख्य सचिव, सचिवों और राज्य के नौकरशाहों को अपने संबोधन में भारद्वाज ने कहा 'सिद्धांतों के आधार पर और एक दूसरे को सम्मान देते हुए काम करिए।'

 उन्होंने राज्य के नौकरशाहों की सराहना करते हुए कहा कि वह अन्य राज्यों में अपने समकक्षों की तुलना में बेहतर काम कर रहे हैं। गुजरे जमाने की याद करते हुए येद्दियुरप्पा ने कहा कि राजनीति में आने से पहले, कभी वह एक क्लर्क के तौर पर सरकारी नौकरी करते थे। उन्होंने कहा 'मुख्यमंत्री बनने के बाद, मैंने कई सबक सीखे। आने वाले दो वर्षों में मैं पारदर्शी प्रशासन पर पूरा ध्यान दूंगा। इसके लिए मैं सभी वरिष्ठों का सहयोग चाहता हूं।'

गुरुवार, 24 मार्च 2011

पीएम को नैतिकता के कठघरे में लाने की कोशिश

पीएम को नैतिकता के कठघरे में लाने की कोशिश




नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। दोबारा मिले जनादेश का हवाला देकर विकिलीक्स रहस्योद्घाटन पर विपक्ष को चुप कराने वाले प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को बुधवार को नैतिकता के कठघरे में घेरने की कोशिश हुई। मुख्य विपक्ष भाजपा के साथ जदयू और वामदलों ने भी कुछ अकाट्य तर्को के साथ उन्हें आगाह किया कि इतिहास से डरें। पैसे के बदले वोट का नजारा सबकी आंखों के सामने हुआ है। संसदीय समिति भी मान चुकी है कि इसकी पर्याप्त जांच होनी चाहिए। लिहाजा ऐसा काम न करें कि उनकी रहबरी पर ही सवाल खड़े हो जाएं। उन्होंने मांग की कि इसकी जांच सीबीआइ से हो और उसमें उन लोगों के भी नाम जोड़े जाएं जिनका विकिलीक्स में जिक्र है। बुधवार को भी राजग ने प्रधानमंत्री के जवाब से असंतोष जताते हुए वाकआउट किया।

पिछले सप्ताह संसद में विकिलीक्स पर हुए प्रधानमंत्री के बयान को विपक्ष ने कई सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। बुधवार को दोनों सदनों में चर्चा को दौरान विपक्ष की ओर से सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, गुरुदास दासगुप्ता, शरद यादव सरीखे नेताओं ने आगाह किया कि किसी की आड़ में छिपकर चेहरा बचाने की कोशिश न करें। सुषमा ने कहा कि विकिलीक्स ने विपक्ष के आरोपों को पुष्ट किया है कि सरकार बचाने के लिए खरीद फरोख्त की गई थी। विकिलीक्स ने घटना का जिक्र किया है और उसमें सच्चाई के अलावा कुछ नहीं हो सकता है। खासतौर पर तब जबकि संसद में इसकी तस्वीर पहले ही दिख चुकी है। प्रधानमंत्री के बयान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की आदत है कि वह 2जी को राजा के माथे, राष्ट्रमंडल को कलमाड़ी के माथे मढ़कर अपना बचाव करते रहे हैं। सुषमा के साथ गुरुदास ने भी कहा कि जनादेश मिलने के साथ सारे अपराध खत्म नहीं हो जाते हैं। सरकार के घाव को कुरेदते हुए उन्होंने कहा कि 1984 के सिख दंगे के बाद कांग्रेस बहुत बड़े बहुमत से जीती थी, तो क्या सरकार उस दाग से बच सकती है।

राज्यसभा में जेटली ने भी कहा कि लेन देन के दस्तावेजी सबूत हैं। लेकिन सरकार गुनहगारों को सजा दिलाने की बजाय उन पर अंगुली उठा रही है जिन्होंने इसका पर्दाफाश किया। शरद यादव ने प्रधानमंत्री के इकबाल पर सवाल उठाया। प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सीवीसी और 2जी के मामले में सरकार को कोर्ट के शरणागत होना पड़ा है। मुलायम सिंह पूरे मामले में बचाव पक्ष की भूमिका में रहे।

मनमोहन ने भी सीखी अदा..

नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। अगर लड़ाई तर्को और तथ्यों की बजाय जज्बात और अल्फाज की थी तो यकीनन जीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हुई। बोझिल गंभीरता का पर्याय बन चुके डॉ. मनमोहन सिंह इस बार बिल्कुल नए अंदाज में थे। इन कुछ क्षणों में उन्होंने तकरीबन आठ दशकों में अपनी ही बनाई छवि को पूरी तरह चुनौती दे दी।

'माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं..। तू मेरा शौक देख.. मेरा इंतजार देख।' शायराना अदा के साथ., जम कर रस लेते हुए., शब्दों के बीच पर्याप्त विराम दे., और सामने बैठी विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आंखों में आंखें डाल.. जिस तरह प्रधानमंत्री ने इकबाल की इन पंक्तियों को पेश किया, ये लम्हे उनके पूरे सार्वजनिक जीवन के सबसे खास मौकों में जुड़ जाएंगे।

अपना भाषण तक देख कर पढ़ने वाले मनमोहन सिंह ने इन पंक्तियों के जरिए विपक्ष पर जोरदार वार कर दिया। कुछ देर पहले ही विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उन पर हमले के लिए इकबाल का सहारा ले कर कहा था- 'ना इधर, उधर की तू बात कर.. ये बता कि काफिला क्यों लुटा। हमें रहजनों से गिला नहीं.. तेरी रहबरी का सवाल है।' लेकिन मनमोहन सिंह की आश्चर्यजनक सहजता और आत्म विश्वास ने जैसे पूरी बाजी ही पलट दी।

ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार शेर पढ़ा हो। कुर्सी संभालने के तुरंत बाद पाकिस्तान के तब के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को उन्होंने दोनों मुल्कों के रिश्तों के सिलसिले में यह शेर सुनाया था-'आ कि इन तरीकों से सुर्खियां पैदा करें..। इस जमीन की बस्तियों से आसमान पैदा करें।' एक शेर मनमोहन सिंह का खास पसंदीदा है- 'कुछ ऐसे भी मंजर हैं तारीख की नजरों में..। लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई।' यह शेर उन्होंने पिछले सत्र में दूसरी बार सुनाया था।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

मानवाधिकार पर भारत को शिक्षा न दे अमेरिका

मानवाधिकार पर भारत को शिक्षा न दे अमेरिका



गांधीनगर। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका से दो टूक कहा है कि वह मानवाधिकार के मुद्दे पर भारत को शिक्षा न दे। इस मामले में वह कितने पानी में है, हमें भी मालूम है। साथ ही केंद्र को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप के मसले का निराकरण करना चाहिए।

मोदी ने यह बातें वर्ष-2006 में तत्कालीन अमेरिकी महावाणिज्य दूत से हुई अपनी बातचीत से संबंधित राजनयिक दस्तावेजों के लीक होने के बाद कही हैं। मोदी ने यह भी कहा कि इन दस्तावेजों में उन्हें सच्चरित्र और गुजरात को प्रगतिशील राज्य बताया गया है। मोदी ने याद करते हुए कहा, कि माइकल ओवेन ने गुजरात के बारे में चर्चा की थी। मैंने उनकी आखों में देखा और कहा कि अमेरिका को मानवाधिकार के मामले में हमें सलाह नहीं देनी चाहिए।

गौरतलब है कि 2006 में जब ओवेन की मोदी से मुलाकात हुई थी तो उस वक्त वह मुंबई में अमेरिकी महावाणिज्य दूत थे। मोदी ने विकिलीक्स द्वारा ओवेन के साथ दो नवंबर 2006 को हुई बातचीत के कथित दस्तावेजों को लीक किए जाने के मद्देनजर अपने रुख को दोहराया है। उसमें ओवेन ने कहा था कि मोदी से सीधी बातचीत से हम गुजरात में मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में अमेरिकी सरकार की चिंताओं के बारे में स्पष्ट संदेश दे सकेंगे।

अमेरिका ने वर्ष 2002 के गुजरात दंगे के मद्देनजर 2005 में भाजपा के इस कद्दावर नेता को वीजा देने से इंकार कर दिया था। मोदी ने मंगलवार को संवाददाताओं से कहा कि अमेरिका हमें मानवता की सलाह न दे। मैं भारत का बेटा हूं और मैं जानता हूं कि आपने मानवाधिकारों का किस तरह उल्लंघन किया है। अच्छी बात है कि बातचीत को सही तरीके से पेश किया गया है।

विकिलीक्स दस्तावेजों का हवाला देकर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राजनयिकों ने 2006 में मोदी के राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व हासिल करने की संभावना का सामना करने की स्थिति को देखा।

ओवेन ने अपने दस्तावेज में मोदी के साथ अमेरिका के संवाद शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। दस्तावेज में ओवेन ने कहा कि इस आधार पर मोदी से बातचीत का समर्थन किया कि कल अगर मोदी राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका हासिल करें और हम उनसे संवाद करने की कोशिश करें तो भाजपा हमें अवसरवादी नहीं कहे।

लीक हुए अमेरिकी राजनयिक दस्तावेज में प्रणब मुखर्जी की वित्त मंत्री के तौर पर नियुक्ति के संबंध में कही गई बातों के मद्देजर भारत के आतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप के बारे में पूछे गए सवाल पर मोदी ने कहा कि भारत सरकार को भारत के आतरिक मामले में अमेरिका के हस्तक्षेप के मुद्दे का निराकरण करना चाहिए।

मोदी ने कहा कि अमेरिका ने मुझे सच्चरित्र बताया है। अनेक सच्चरित्र लोग हैं लेकिन उन्होंने मुझे सच्चरित्र बताया है। यह गुजरात के लोगों के लिए अच्छी बात है। विकिलीक्स ने दो चेहरे दिखाए हैं। एक भारत सरकार का और दूसरा प्रगतिशील गुजरात का।

अमेरिका के मुंबई वाणिज्य दूतावास के 2850 शब्दों के इस मूल्याकन को अमेरिकी विदेश मंत्रालय को भेजे जाने से पहले नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने हरी झडी दी थी। इसमें कहा गया है कि निकट भविष्य में भाजपा में अगर मोदी राष्ट्रीय नेतृत्व हासिल करते हैं तो अमेरिकी सरकार यह फैसला करने पर मजबूर होगी कि वह राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हस्ती के साथ कैसे निपटे, जिसका हमने बी। बटा बी 2 रद्द कर दिया था।

प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस

प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस



नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सरकार और विपक्ष के बीच बात थोड़ी संभलती नहीं है कि फिर से जंग छिड़ जाती है। तीन दिन के अवकाश के बाद मंगलवार को संसद में दोनों आमने-सामने हुए तो नाक की लड़ाई शुरू हो गई। पहले वित्त विधेयक या पहले भ्रष्टाचार और विकिलीक्स पर चर्चा को लेकर दोनों सदनों में बात इतनी बढ़ी कि कई बार कार्यवाही स्थगित हुई। अंतत: सरकार ने अपने कामकाज को ही महत्व दिया तो नाराज राजग ने वाकआउट कर अपना विरोध जताया। इससे पहले विकिलीक्स पर प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताते हुए दोनों सदनों में उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दिया जा चुका था जो लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के विचाराधीन है।

सरकार और विपक्ष के बीच एक दूसरे की मंशा पर आशंका गहरा गई है। विकिलीक्स के रहस्योद्घाटनों पर दो दिन पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान से असंतुष्ट विपक्ष ने पहले ही पेशबंदी कर ली थी। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया था। इसके अलावा चर्चा का भी नोटिस दिया गया था। सुषमा के समर्थकों में भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और जदयू अध्यक्ष शरद यादव थे। बाद में भाकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने भी इसका समर्थन किया। दरअसल वह जानते थे कि विशेषाधिकार हनन के नोटिस को विचाराधीन बताकर मुद्दा आगे के लिए टाल दिया जाएगा। ऐसे में चर्चा के नोटिस के जरिए प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश थी।

सुषमा और लालकृष्ण आडवाणी ने नेता सदन प्रणब मुखर्जी से टेलीफोन पर बातचीत कर चर्चा के लिए हामी भी भरवा ली थी। लेकिन सदन में बात 'पहले मैं तो पहले मैं' में अटक गई। अंतत: प्रणब ने साफ कर दिया कि वित्त विधेयक पारित होने के बाद ही चर्चा करवाई जा सकती है। आक्रामक सत्तापक्ष विपक्ष के नेताओं को बोलने देने के लिए ही तैयार नहीं था। ऐसे में दोनों सदनों में दो बार कार्यवाही स्थगित हुई।

सूत्र बताते हैं कि इस बीच सुषमा ने प्रणब से बात कर प्रस्ताव दिया कि लोकसभा में वित्त विधेयक पर चर्चा हो और उसी बीच राज्यसभा में प्रधानमंत्री के बयान पर चर्चा शुरू हो। लेकिन सरकार उसके लिए राजी नहीं थी। इस स्थिति में जब लोकसभा तीसरी बार बैठी और वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हुई तो सुषमा ने कहा कि विपक्ष भी वित्त विधेयक में हिस्सा लेना चाहता था, लेकिन सरकार के रुख से साफ हो गया कि वह किस तरह अपना कामकाज निपटाना चाहती है। लिहाजा वित्त विधेयक राजग की गैर मौजूदगी में ही पारित हुआ।

बुधवार, 9 मार्च 2011

द्रमुक-कांग्रेस में सहमति, कांग्रेस के हिस्से 63 सीटें

द्रमुक-कांग्रेस में सहमति, कांग्रेस के हिस्से 63 सीटें





नई दिल्ली/चेन्नई। द्रमुक और काग्रेस ने सीट बंटवारे को लेकर चेन्नई में औपचारिक समझौते पर दस्तखत किए। द्रमुक ने काग्रेस को 63 सीटें दीं।

काग्रेस नेता तथा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने डीएमके के केंद्रीय मंत्रियों एमके अझागिरी और दयानिधि मारन के साथ दोनों दलों में समझौते की घोषणा की। आजाद तमिलनाडु के प्रभारी भी हैं। उन्होंने कहा, डीएमके और काग्रेस नेताओं ने तय किया है कि काग्रेस 63 सीटों पर चुनाव ल़डेगी। हम साथ लडे़ंगे और एक बार फिर राज्य में सरकार बनाने में सफल होंगे।

डीएमके काग्रेस को विधानसभा की 234 सीटों में से 63 सीटें देने के लिए तैयार हो गई है। मंगलवार को सीटों के बंटवारे पर सहमति की घोषणा से पहले काग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाधी के आवास पर एक घटे तक बैठक चली। डीएमके और काग्रेस को फिर से एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अझागिरी ने आजाद की बातों की पुष्टि की। लेकिन इस बारे में उन्होंने विस्तृत जानकारी नहीं दी। चेन्नई में पार्टी के करीब 3000 कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री करूणानिधि ने कहा कि गठबंधन के व्यापक हितों को देखते हुए उनकी पार्टी ने बलिदान किया है और काग्रेस को अतिरिक्त सीटें देने के लिए तैयार हुई है। उन्होंने इसे खुशी का दिन बताया और भरोसा जताया कि जीत दर्ज करने के लिए गठबंधन के साथ नई ऊर्जा के साथ चुनाव ल़डेंगे।

करूणानिधि ने काग्रेस के लिए एक-एक सीट छो़डने के लिए अपनी दो प्रमुख सहयोगी पार्टियों पीएमके तथा इंडियन मुस्लिम लीग [आईयूएमएल] की प्रशसा की। उन्होंने काग्रेस और डीएमके के बीच दूरी पैदा करने की कोशिश करने पर मीडिया के एक वर्ग की आलोचना भी की।

ज्ञात हो कि डीएमके ने पहले कहा था कि काग्रेस द्वारा 13 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए अपनी पसंद की 63 सीटों की माग करना जायज नहीं है। डीएमके ने शनिवार को केंद्र सरकार में शामिल अपने छह मंत्रियों को सोमवार रात तक इस्तीफा देने के लिए कहा था लेकिन काग्रेस द्वारा गतिरोध का हल निकालने के लिए और ज्यादा समय मागने पर मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया।

गतिरोध को समाप्त करने के लिए अझागिरी और मारन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और आजाद के साथ चर्चा करने के बाद सोमवार रात सोनिया गाधी से मिलने पहुंचे थे। डीएमके ने विधानसभा चुनावों के लिए छह पार्टियों से समझौता किया है। उसने विधानसभा की 234 सीटों में से 113 सीटें अपने सहयोगियों को दिया है। डीएमके ने काग्रेस को [63], केएमके को [7], वीसीके को [10], पीएमके को [30] और आईयूएमएल को [2] सीटें दी हैं।

शनिवार, 5 मार्च 2011

द्रमुक ने तोड़ी यूपीए से सात साल पुरानी दोस्ती

द्रमुक ने तोड़ी यूपीए से सात साल पुरानी दोस्ती




नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे की खींचतान संप्रग गठबंधन पर भारी पड़ गई। दबाव की इस राजनीति में द्रमुक ने सरकार से बाहर जाने एलान कर दिया है तो दूसरी तरफ कांग्रेस भी अकेले चुनाव में जाने को तैयार है। वैसे सात साल पुराने इस रिश्ते पर बातचीत के रास्ते अभी भी बंद नहीं हुए हैं। द्रमुक मुद्दों पर आधारित समर्थन जारी रखने की बात कह रही है।

चेन्नई में दो घंटे तक चली बैठक के बाद द्रमुक सुप्रीमों व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने कांग्रेस पर गठबंधन तोड़ने का आरोप लगाते हुए सभी छह केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे का एलान कर दिया। करुणानिधि ने कहा कि फिलहाल द्रमुक बाहर से सरकार को 'मुद्दों पर आधारित' समर्थन देता रहेगा। साथ ही द्रमुक कोटे से केंद्रीय मंत्री टी.आर. बालू ने गठबंधन जारी रखने और तमिलनाडु में समझौता होने की गुंजाइश कायम रखते हुए बयान जारी किया कि उनकी पार्टी सरकार से बाहर जाने के फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। बशर्ते सीटों के मामले में कांग्रेस तार्किक रवैया अपनाए।

करुणानिधि के इस दांव के बाद कांग्रेस दबाव में आ गई है। उसकी असली चिंता तमिलनाडु नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल और केरल है। द्रमुक के बाहर होने के बाद इन दोनों राज्यों में सहयोगी दल कांग्रेस पर दबाव और बढ़ा देंगे। इन हालात के मद्देनजर प्रणब मुखर्जी डीएमके नेतृत्व से बात करेंगे और कांग्रेस किसी दूत को भी चेन्नई भेजेगी। बीच का रास्ता निकालने की कोशिशों का ही नतीजा है कि कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अभी बातचीत जारी है, लिहाजा इसे अंतिम न समझा जाए।

तमिलनाडु में पिछले विधानसभा चुनाव में 48 सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस ने इस दफा बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए द्रमुक को 60 सीटों तक झुका लिया। अब कांग्रेस 63 से नीचे आने को तैयार नहीं थी और वास्तव में झगड़ा ज्यादा सीटें लेने से ज्यादा जिताऊ या मजबूत सीटें हथियाने को लेकर है। आमतौर पर द्रमुक की जिद के आगे झुकती रही कांग्रेस ने मौजूदा सियासी हालात का फायदा उठाते हुए करुणानिधि को खूब झुकाया, लेकिन तनाव से सात साल पुराना गठबंधन टूटने के कगार पर जा पहुंचा है। द्रमुक ने चेन्नई में एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि 'कांग्रेस का रुख चौंकाने वाला है। उनके रुख से साफ है कि वे अब हमें संप्रग में देखना नहीं चाहती।'

कुल मिलाकर करुणानिधि ने गठबंधन में ज्यादती का ठीकरा भी कांग्रेस के मत्थे मढ़ दिया है। वैसे भी यह पहले बार नहीं है कि द्रमुक ने सरकार से बाहर रहने का फैसला किया हो। संप्रग-टू बनते ही मंत्रिमंडल में ए. राजा को शामिल कराने के लिए द्रमुक ने सरकार से बाहर रहकर कांग्रेस को ब्लैकमेल किया था। अब देखना है कि इस दफा उनका यह दांव कितना कारगर साबित होता है।

सरकार को खतरा नहीं, लेकिन बढ़ेंगी मुश्किलें

नई दिल्ली। यदि द्रमुक संप्रग से समर्थन वापस भी ले तो केंद्र में सरकार को कोई खतरा नहीं होगा, लेकिन उसकी सियासी मुश्किलें जरूर बढ़ेंगी। संप्रग के 272 सांसदों में से यदि द्रमुक के 16 बाहर चले जाएं तो लोकसभा में उसकी संख्या बहुमत के लिए जरूरी आधी सीटों से भी कम 256 रह जाएगी। हालांकि, लोकसभा की 542 सीटों के लिहाज से वह अल्पमत में इसलिए नहीं आएगी क्योंकि उसके पास सपा के 22, बसपा के 21 और राजद के चार सांसदों समेत कुल 47 सांसदों का बाहर से समर्थन मौजूद है।

द्रमुक के बाहर जाने के बाद संप्रग के दूसरे सहयोगी ममता, शरद पवार के अलावा बाहर से समर्थन दे रहे सपा और बसपा के तेवर बदलने का खतरा कायम रहेगा। चूंकि, अगले साल उत्तार प्रदेश के विधानसभा चुनाव हैं, लिहाजा पार्टी अभी वहां अपने प्रतिद्वंदी दलों पर निर्भरता भी नहीं चाहती। इसीलिए, कांग्रेस का एक खेमा अभी द्रमुक को पूरी तरह से विपक्षी खेमे में देखने से बचना चाहता है।